Monday, May 17, 2010

स्वप्न बन कर रह गया है,
मन के स्रोत से जो बन के निकला था भागीरथी,
मरू की किसी आंधी सा,उड़ गया है,
स्वप्न बन कर रह गया है।

जर-जर दुर्ग सा ढ़ह गया,
हताश नयनो से नीर सा बह गया है,
जल चुकी किताब का अद्ध्याए बन रह गया है,
स्वप्न बन कर रह गया है।

धनुष से तेरे जो छूटा,वो अब आत्मघाती हो रहा है,
पर तेरी निष्क्रियता से लगता है,तू सो रहा है।

था तुझे विश्वास,तेरे पराक्रम पर सदा,
पर तेरी इस हार से तू काठ बन कर रह गया है।

स्वप्न बन कर रह गया है.................

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