Sunday, May 23, 2010

वीणा

मामा जी विचित्र वीणा वादक है। पूरा जीवन अपनी वीणा के माध्यम से स्वर साधना करते रहे किन्तु वो नाम और शोहरत नहीं मिली जिसके वो हक़दार है। लेकिन मामा जी में, मै जो संतोष और आनंद देखता हूँ वह अद्भुत है। मामा जी अपनी वीणा के बारे में क्या सोचते है, वो उन्होंने कभी मुझसे कहा तो नहीं लेकिन क्या सोचते होंगे , मैंने आगे की पंक्तिओं में उकेरने की कोशिश की है।

तेरा श्रृंगार कर मधुमय जीवन करता हूँ,
तुझ में व्याप्त है, गौरव मेरा,
तू ही मेरी वाणी है,
तेरे आलिंगन से देखो शोभा मेरी बढती है,
औ जिसमे मै नित सराबोर हूँ, वह सुधा तुझही से बहती है।

मेरा सर्वस्व, मेरी वीणा है,
इसके तारों से बहती, मेरे अंतर की पीड़ा है।
जब तार ये झंकृत होते है, अमृत की धारा रहती है,
मेरे अंतर से मानो नित nayee bhageerathi bahati है।

कभी-कभी सुर से फूटे, अथाह वेदना का सागर,
औ कभी देखो छलकआती रस पूरित सुख की गागर।

जब मेरी वीणा के तारों को, पवन स्पर्श कर जाती है,
वो प्राणवान हो गाती है, वो शीतलता फैलाती है।

मैंने सदा इसी माध्यम से अपने भावों को व्यक्त किया,
मैंने सदा इसी के द्वारा अपने देवों को अर्घ्य दिया।

तेरे रूप में वंदन करता हूँ मै अपनी माता का,
तेरे दर्शन से है होता, सूर्योदय मेरे प्रातः का।

वीणा का ये वादक करता, श्रद्धा के ये सुमन है अर्पित,
वीणा का साधक कहता, तुझ पर मेरा सर्वस्व समर्पित।

मेरी वीणा मुझ से कहती,
अंतर के तारों को तेरे,कोई छेड़े कितना भी,
रस तुम उसको उतना देना,
संभव हो जितना भी।

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