हस्त बरस चित्रा मंड़राय। घर बैठे किसान सुख पाय॥
हस्ती नक्षत्र में बरसने से और चित्रा में बादलों के रहने से किसान घर बैठे सुख पाता है। क्यों कि चित्रा की धूप बहुत कड़ी और विषाक्त होती है।
Tuesday, July 20, 2010
Friday, July 2, 2010
Tuesday, June 29, 2010
Monday, June 28, 2010
Saturday, June 26, 2010
घाघ-भड्डरी .........
असुनी नलिया अंत विनासै, गली रेवती जल को नासै।
भरनी नासै तृनौ सहूतो, कृतिका बरसै अंत बहूतो॥
यदि चैत मास में आश्विन नक्षत्र बरसे तो वर्षा ऋतु के अंत में सूखा पड़ेगा। रेवती नक्षत्र में बरसे नाम मात्र को वर्षाहोगी, भरणी नक्षत्र बरसे तो घास भी सूख जाऐगी। और यदि कृतिका नक्षत्र बरसे तो वर्षा अच्छी होगी।
असुनी नलिया अंत विनासै, गली रेवती जल को नासै।
भरनी नासै तृनौ सहूतो, कृतिका बरसै अंत बहूतो॥
यदि चैत मास में आश्विन नक्षत्र बरसे तो वर्षा ऋतु के अंत में सूखा पड़ेगा। रेवती नक्षत्र में बरसे नाम मात्र को वर्षाहोगी, भरणी नक्षत्र बरसे तो घास भी सूख जाऐगी। और यदि कृतिका नक्षत्र बरसे तो वर्षा अच्छी होगी।
Wednesday, June 16, 2010
घाघ भड्डरी..........................आज की कहावत...
अखै तीज तिथि के दिन, गुरु होवै सजूत।
तो भाखै यों भड्डरी, उपजै नाज बहूत॥
यदि वैशाख में अक्षय तृतीया को गुरुवार हो तो भड्डरी कहती है की समझ लेना चाहिए की खूब अन्न पैदा होगा।
सावन सुक्ला सप्तमी, जो गरजै अधिरात।
बरसै तो झूरा परै, नाहीं समौ सुकाल॥
यदि सावन मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को आधी रात के समय बादल गरजे और पानी बरसे तो सुखा पड़ेगा और बादल तो गरजे लेकिन पानी न बरसे तो समझ लेना चाहिए की सुकाल रहेगा।
अखै तीज तिथि के दिन, गुरु होवै सजूत।
तो भाखै यों भड्डरी, उपजै नाज बहूत॥
यदि वैशाख में अक्षय तृतीया को गुरुवार हो तो भड्डरी कहती है की समझ लेना चाहिए की खूब अन्न पैदा होगा।
सावन सुक्ला सप्तमी, जो गरजै अधिरात।
बरसै तो झूरा परै, नाहीं समौ सुकाल॥
यदि सावन मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को आधी रात के समय बादल गरजे और पानी बरसे तो सुखा पड़ेगा और बादल तो गरजे लेकिन पानी न बरसे तो समझ लेना चाहिए की सुकाल रहेगा।
Tuesday, June 15, 2010
Monday, June 14, 2010
Sunday, June 13, 2010
Saturday, June 12, 2010
घाघ-भड्डरी कल से आगे.....................
श्रीमती शांति देवी और श्री देश कुमार शुक्ल के कनिष्ठ पुत्र श्री प्रमोद कुमार शुक्ल जी ने भी इन कहावतो के संकलन में बहुत महतवपूर्ण योगदान दिया है। मै आप सभी के प्रति अपना आभार व्यक्त करता हूँ।
अब हम उसी क्रम में, इन कहावतो में प्रवेश करेंगे ,जो श्री देव नारायण जी ने अपनी पुस्तक में दियाहै।
प्रथम अद्ध्याय सुकाल और अकाल
सर्व तपै जो रोहिणी,सर्व तपै जो मूर।
परिवा तपै जो जेठ की,उपजै सातों तूर।
यदि रोहिणी (एक नक्षत्र है)भर पूरा तपे और मूल भी पूरा तपे (तपने का अर्थ गर्मी पड़ने से है)तथाजेठ(हिंदी का एक महीना है)की प्रतिपदा(महीने की पहली तिथि)भी तपे तो सातों प्रकार के अन्न पैदा होंगे। मतलब खूब पैदावार होगी।
शुक्रवार की बादरी,रही सनीचर छाय।
तो यों भाखै भड्डरी,बिन बरसे ना जाय।
यदि शुक्रवार को बादल और शनिवार को छाया रहे तो भड्डरी कहती है कि बारिश होना निश्चित है।
भादों कि छट चांदनी,जो अनुराधा होय।
उबड़ खाबड़ बोय दे, अन्न घनेरा होय॥
यदि भादों(हिंदी का महीना)की शुक्ल पक्ष(वो १५ दिन,जिनमे चाँद बढ़ता है)की छट को अनुराधा नक्षत्रपड़े तो उबड़ खाबड़(जो जमीन समतल ना हो और जिसपर खेती ना की जा सकती हो)जमीन में भी उसदिन यदि बुआई कर दी जाय, तो घना अन्न पैदा होगा(अर्थात बहुत पैदावार होगी)।
आज के लिए इतना ही......
श्रीमती शांति देवी और श्री देश कुमार शुक्ल के कनिष्ठ पुत्र श्री प्रमोद कुमार शुक्ल जी ने भी इन कहावतो के संकलन में बहुत महतवपूर्ण योगदान दिया है। मै आप सभी के प्रति अपना आभार व्यक्त करता हूँ।
अब हम उसी क्रम में, इन कहावतो में प्रवेश करेंगे ,जो श्री देव नारायण जी ने अपनी पुस्तक में दियाहै।
प्रथम अद्ध्याय सुकाल और अकाल
सर्व तपै जो रोहिणी,सर्व तपै जो मूर।
परिवा तपै जो जेठ की,उपजै सातों तूर।
यदि रोहिणी (एक नक्षत्र है)भर पूरा तपे और मूल भी पूरा तपे (तपने का अर्थ गर्मी पड़ने से है)तथाजेठ(हिंदी का एक महीना है)की प्रतिपदा(महीने की पहली तिथि)भी तपे तो सातों प्रकार के अन्न पैदा होंगे। मतलब खूब पैदावार होगी।
शुक्रवार की बादरी,रही सनीचर छाय।
तो यों भाखै भड्डरी,बिन बरसे ना जाय।
यदि शुक्रवार को बादल और शनिवार को छाया रहे तो भड्डरी कहती है कि बारिश होना निश्चित है।
भादों कि छट चांदनी,जो अनुराधा होय।
उबड़ खाबड़ बोय दे, अन्न घनेरा होय॥
यदि भादों(हिंदी का महीना)की शुक्ल पक्ष(वो १५ दिन,जिनमे चाँद बढ़ता है)की छट को अनुराधा नक्षत्रपड़े तो उबड़ खाबड़(जो जमीन समतल ना हो और जिसपर खेती ना की जा सकती हो)जमीन में भी उसदिन यदि बुआई कर दी जाय, तो घना अन्न पैदा होगा(अर्थात बहुत पैदावार होगी)।
आज के लिए इतना ही......
घाघ-भड्डरी की कहावते
मै उत्तर प्रदेश के उन्नाव जनपद का रहने वाला हूँ। वैसे तो घाघ-भड्डरी की कहावते पूरे उत्तर भारत में कही जाती है लेकिन हमारे जनपद में,ये कहावते जन- जन की जुबान पर रहती है। हमारे यहाँ बैसवारा क्षेत्र के लोगो की बोल-चाल का अभिन्न अंग है ये कहावते। इसका एक कारण शायद ये भी है की, ये क्षेत्र घाघ-भड्डरी का ही स्थान माना जाता है। इस सम्बन्ध में अनेक मत है ,जिनमे प्रवेश करना ठीक नहीं होगा क्यों कि ये विवाद को निमंत्रित करने जैसा होगा। और हम तो यहाँ संवाद स्थापित करने के लिए आए है। एक और बात को लेकर लोगो में मतान्तर है कि ,घाघ-भड्डरी एक ही व्यक्ति है या ये दो अलग लोगो के नाम है। हमारे यहाँ माना जाता है कि,घाघ नाम के आदमी कि पत्नी थी भड्डरी। ये भी कहा जाता है कि, भड्डरी, घाघ से अधिक कुशाग्र और परिस्थितिओं को अधिक गहराई से देखने, समझने और कहने में माहिर थी। जो भी हो वो शोध का विषय है, हम यहाँ उन दुर्लभ, बहुमूल्य और अचूक कहावतो को संजोने और अधिक से अधिक लोगो तक पहुचाने के मंशा रखते है।
एक बात और कहना चाहता हूँ । वैसे तो कुछ संकलन मेरे पास भी था किन्तु बहुत सारी कहावते मुझे एक पुस्तक में मिली जो कि श्री देव नारायण द्विवेदी जी के अथक परिश्रम और शोध के फलस्वरूप बुक स्टोर्स में उपलब्ध है। मै ह्रदय से, पूरी विनम्रता और आदर के साथ परम आदरणीय श्री देव नारायण जी को धन्यवाद करता हुआ उनके चरणों में वंदन करता हूँ।
मुझे इन कहावते की सबसे पहले विस्तृत जानकारी जिनसे मिली, वो है मेरे बाबा तुल्य श्री देश कुमार शुक्ल जी, पूर्व प्राचार्य कमला पति इंटर कॉलेज, बीघापुर उन्नाव एवं उनकी पत्नी और मेरी परम आदरणीय दादी श्रीमतीशांति देवी जी, जिनका नाम लिए बिना मै ये कार्य शुरू ही नहीं कर सकता हूँ।
मै उत्तर प्रदेश के उन्नाव जनपद का रहने वाला हूँ। वैसे तो घाघ-भड्डरी की कहावते पूरे उत्तर भारत में कही जाती है लेकिन हमारे जनपद में,ये कहावते जन- जन की जुबान पर रहती है। हमारे यहाँ बैसवारा क्षेत्र के लोगो की बोल-चाल का अभिन्न अंग है ये कहावते। इसका एक कारण शायद ये भी है की, ये क्षेत्र घाघ-भड्डरी का ही स्थान माना जाता है। इस सम्बन्ध में अनेक मत है ,जिनमे प्रवेश करना ठीक नहीं होगा क्यों कि ये विवाद को निमंत्रित करने जैसा होगा। और हम तो यहाँ संवाद स्थापित करने के लिए आए है। एक और बात को लेकर लोगो में मतान्तर है कि ,घाघ-भड्डरी एक ही व्यक्ति है या ये दो अलग लोगो के नाम है। हमारे यहाँ माना जाता है कि,घाघ नाम के आदमी कि पत्नी थी भड्डरी। ये भी कहा जाता है कि, भड्डरी, घाघ से अधिक कुशाग्र और परिस्थितिओं को अधिक गहराई से देखने, समझने और कहने में माहिर थी। जो भी हो वो शोध का विषय है, हम यहाँ उन दुर्लभ, बहुमूल्य और अचूक कहावतो को संजोने और अधिक से अधिक लोगो तक पहुचाने के मंशा रखते है।
एक बात और कहना चाहता हूँ । वैसे तो कुछ संकलन मेरे पास भी था किन्तु बहुत सारी कहावते मुझे एक पुस्तक में मिली जो कि श्री देव नारायण द्विवेदी जी के अथक परिश्रम और शोध के फलस्वरूप बुक स्टोर्स में उपलब्ध है। मै ह्रदय से, पूरी विनम्रता और आदर के साथ परम आदरणीय श्री देव नारायण जी को धन्यवाद करता हुआ उनके चरणों में वंदन करता हूँ।
मुझे इन कहावते की सबसे पहले विस्तृत जानकारी जिनसे मिली, वो है मेरे बाबा तुल्य श्री देश कुमार शुक्ल जी, पूर्व प्राचार्य कमला पति इंटर कॉलेज, बीघापुर उन्नाव एवं उनकी पत्नी और मेरी परम आदरणीय दादी श्रीमतीशांति देवी जी, जिनका नाम लिए बिना मै ये कार्य शुरू ही नहीं कर सकता हूँ।
Sunday, May 23, 2010
वीणा
मामा जी विचित्र वीणा वादक है। पूरा जीवन अपनी वीणा के माध्यम से स्वर साधना करते रहे किन्तु वो नाम और शोहरत नहीं मिली जिसके वो हक़दार है। लेकिन मामा जी में, मै जो संतोष और आनंद देखता हूँ वह अद्भुत है। मामा जी अपनी वीणा के बारे में क्या सोचते है, वो उन्होंने कभी मुझसे कहा तो नहीं लेकिन क्या सोचते होंगे , मैंने आगे की पंक्तिओं में उकेरने की कोशिश की है।
तेरा श्रृंगार कर मधुमय जीवन करता हूँ,
तुझ में व्याप्त है, गौरव मेरा,
तू ही मेरी वाणी है,
तेरे आलिंगन से देखो शोभा मेरी बढती है,
औ जिसमे मै नित सराबोर हूँ, वह सुधा तुझही से बहती है।
मेरा सर्वस्व, मेरी वीणा है,
इसके तारों से बहती, मेरे अंतर की पीड़ा है।
जब तार ये झंकृत होते है, अमृत की धारा रहती है,
मेरे अंतर से मानो नित nayee bhageerathi bahati है।
कभी-कभी सुर से फूटे, अथाह वेदना का सागर,
औ कभी देखो छलकआती रस पूरित सुख की गागर।
जब मेरी वीणा के तारों को, पवन स्पर्श कर जाती है,
वो प्राणवान हो गाती है, वो शीतलता फैलाती है।
मैंने सदा इसी माध्यम से अपने भावों को व्यक्त किया,
मैंने सदा इसी के द्वारा अपने देवों को अर्घ्य दिया।
तेरे रूप में वंदन करता हूँ मै अपनी माता का,
तेरे दर्शन से है होता, सूर्योदय मेरे प्रातः का।
वीणा का ये वादक करता, श्रद्धा के ये सुमन है अर्पित,
वीणा का साधक कहता, तुझ पर मेरा सर्वस्व समर्पित।
मेरी वीणा मुझ से कहती,
अंतर के तारों को तेरे,कोई छेड़े कितना भी,
रस तुम उसको उतना देना,
संभव हो जितना भी।
तेरा श्रृंगार कर मधुमय जीवन करता हूँ,
तुझ में व्याप्त है, गौरव मेरा,
तू ही मेरी वाणी है,
तेरे आलिंगन से देखो शोभा मेरी बढती है,
औ जिसमे मै नित सराबोर हूँ, वह सुधा तुझही से बहती है।
मेरा सर्वस्व, मेरी वीणा है,
इसके तारों से बहती, मेरे अंतर की पीड़ा है।
जब तार ये झंकृत होते है, अमृत की धारा रहती है,
मेरे अंतर से मानो नित nayee bhageerathi bahati है।
कभी-कभी सुर से फूटे, अथाह वेदना का सागर,
औ कभी देखो छलकआती रस पूरित सुख की गागर।
जब मेरी वीणा के तारों को, पवन स्पर्श कर जाती है,
वो प्राणवान हो गाती है, वो शीतलता फैलाती है।
मैंने सदा इसी माध्यम से अपने भावों को व्यक्त किया,
मैंने सदा इसी के द्वारा अपने देवों को अर्घ्य दिया।
तेरे रूप में वंदन करता हूँ मै अपनी माता का,
तेरे दर्शन से है होता, सूर्योदय मेरे प्रातः का।
वीणा का ये वादक करता, श्रद्धा के ये सुमन है अर्पित,
वीणा का साधक कहता, तुझ पर मेरा सर्वस्व समर्पित।
मेरी वीणा मुझ से कहती,
अंतर के तारों को तेरे,कोई छेड़े कितना भी,
रस तुम उसको उतना देना,
संभव हो जितना भी।
Monday, May 17, 2010
स्वप्न बन कर रह गया है,
मन के स्रोत से जो बन के निकला था भागीरथी,
मरू की किसी आंधी सा,उड़ गया है,
स्वप्न बन कर रह गया है।
जर-जर दुर्ग सा ढ़ह गया,
हताश नयनो से नीर सा बह गया है,
जल चुकी किताब का अद्ध्याए बन रह गया है,
स्वप्न बन कर रह गया है।
धनुष से तेरे जो छूटा,वो अब आत्मघाती हो रहा है,
पर तेरी निष्क्रियता से लगता है,तू सो रहा है।
था तुझे विश्वास,तेरे पराक्रम पर सदा,
पर तेरी इस हार से तू काठ बन कर रह गया है।
स्वप्न बन कर रह गया है.................
मन के स्रोत से जो बन के निकला था भागीरथी,
मरू की किसी आंधी सा,उड़ गया है,
स्वप्न बन कर रह गया है।
जर-जर दुर्ग सा ढ़ह गया,
हताश नयनो से नीर सा बह गया है,
जल चुकी किताब का अद्ध्याए बन रह गया है,
स्वप्न बन कर रह गया है।
धनुष से तेरे जो छूटा,वो अब आत्मघाती हो रहा है,
पर तेरी निष्क्रियता से लगता है,तू सो रहा है।
था तुझे विश्वास,तेरे पराक्रम पर सदा,
पर तेरी इस हार से तू काठ बन कर रह गया है।
स्वप्न बन कर रह गया है.................
Saturday, May 8, 2010
आज एक कार्यक्रम में, मै अपने एक पिता तुल्य बुजुर्ग से कुछ बात कर रहा था, कि अचानक मेरा मोबाइल बज उठा.मैंने आदरणीय से इजाज़त ली और दो मिनट बात पुनः उन से मुखातिब हुआ तो मोहतरम चल रही चर्चा को छोड़ कर मोबाइल फ़ोन को गाली देने लगे।गरजे, साला मरी-मुर्दनी में जाओ, वहां ye mardood gaane lagta hai "tu cheez badi hai mast-mast"। मैंने sanchaar kranti कि duhai di तो hujoor bole,ke shanti तो chali gaii। मैंने, hameshaa sampark में bane rahane कि suvidha ka sahara liya तो manyavar, mere और meri lachaar pidhi ke peechhe pad gai। bole tumharaa dosh nahi hai, tumhari generation hi suvidha bhogi hai। मै कुछ der chup रहा ,phir saraa lihaaz kinaare rakh कर मैंने palatwaar kiya। मैंने kaha sahab, dosh aapka bhi nahi hai। maslaa sirf itnaa hai कि, aap aur aap क़ी pidhi, har us upkaran aur madhyam ke khilaaph hai, jo samvaad heentaa क़ी sthiti को samapt karene में zara si bhi madadgar saabit ho sakti hai। wo khamosh ho gai.......,lekin, mai soch rahaa thaa, ke kya hum wakai में ananat kaal से chale aa rahe, pidhidyo ke is dwand को smaapt nahi कर sakte? nishchit roop से कर sakte hai! agar aisa hi koi vyavhaarik upkarn dhaaran कर le jiska prayog samvaad heentaa, khatam hi na kre, apitu use janm hi na lene de।
बात-बात में बात nikal aayi तो मैंने madh di। aap ke bhi samajh में aa jai तो kahi jad dijie gaa।
ram-ram
बात-बात में बात nikal aayi तो मैंने madh di। aap ke bhi samajh में aa jai तो kahi jad dijie gaa।
ram-ram
Friday, May 7, 2010
एक ज़मींदार खानदान और बड़े व्यापारिक ,नामवर घराने से होना किसी के लिए भी शान की बात है लेकिन प्रतिष्ठा जब लकीरें खीचती है कार्य के बीच में, कर्म के प्रकार के बीच में ,जब आपके आगे और पीछे चलने वाला,वो बड़ा सा नाम जो वजह है गर्व से ऊँचे हुए आपके मस्तक की,जो कारण है, अहंकार से चौड़ी हुई आपकी छाती की,जिसकी वजह से आपकी चाल का मद लोगो को ठिठकने पर मजबूर कर देता है, जिस शान का नशा आपकी आँखों को औरो को खुद से छोटा या कमतर देखने के लिए उकसाता है, वही शान ,वही बड़ा सा नाम जब सिर्फ आपके लिए किसी काम को छोटा या बड़ा बनाता है,तो यही प्रतिष्ठा का प्याला ,जिसकी चुस्कियां, रंगीनिया बेखेरती थी,एक ऐसा कडुवा घूंट मालूम चलता है,जिसे न पिया ही जा सकता है और न फेंका जा सके.
Thursday, May 6, 2010
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