Saturday, June 12, 2010

घाघ-भड्डरी कल से आगे.....................
श्रीमती शांति देवी और श्री देश कुमार शुक्ल के कनिष्ठ पुत्र श्री प्रमोद कुमार शुक्ल जी ने भी इन कहावतो के संकलन में बहुत महतवपूर्ण योगदान दिया है। मै आप सभी के प्रति अपना आभार व्यक्त करता हूँ।
अब हम उसी क्रम में, इन कहावतो में प्रवेश करेंगे ,जो
श्री देव नारायण जी ने अपनी पुस्तक में दियाहै।

प्रथम अद्ध्याय सुकाल और अकाल

सर्व तपै जो रोहिणी,सर्व तपै जो मूर।
परिवा तपै जो जेठ की,उपजै सातों तूर।


यदि रोहिणी (एक नक्षत्र है)भर पूरा तपे और मूल भी पूरा तपे (तपने का अर्थ गर्मी पड़ने से है)तथाजेठ(हिंदी का एक महीना है)की प्रतिपदा(महीने की पहली तिथि)भी तपे तो सातों प्रकार के अन्न पैदा होंगे। मतलब खूब पैदावार होगी।

शुक्रवार की बादरी,रही सनीचर छाय।
तो यों भाखै भड्डरी,बिन बरसे ना जाय।


यदि शुक्रवार को बादल और शनिवार को छाया रहे तो भड्डरी कहती है कि बारिश होना निश्चित है।


भादों कि छट चांदनी,जो अनुराधा होय।
उबड़ खाबड़ बोय दे, अन्न घनेरा होय॥

यदि भादों(हिंदी का महीना)की शुक्ल पक्ष(वो १५ दिन,जिनमे चाँद बढ़ता है)की छट को अनुराधा नक्षत्रपड़े तो उबड़ खाबड़(जो जमीन समतल ना हो और जिसपर खेती ना की जा सकती हो)जमीन में भी उसदिन यदि बुआई कर दी जाय, तो घना अन्न पैदा होगा(अर्थात बहुत पैदावार होगी)

आज के लिए इतना ही......





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